ट्रंप-ईरान की डील इजरायल को नामंजूर, फिर मंडराने लगा जंग का खतरा

भूमिका: डील तो हुई, लेकिन तनाव कम नहीं हुआ

मध्य-पूर्व में एक बार फिर युद्ध के बादल मंडराने लगे हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान के साथ एक अहम समझौते की घोषणा की है, जिसके तहत होर्मुज जलडमरूमध्य की नाकेबंदी हटाने और युद्धविराम की बात कही गई है। लेकिन इजरायल ने इस डील को “अधूरी और खतरनाक” करार देते हुए सिरे से नकार दिया है। इजरायल के बेरूत पर ताजा हमलों ने इस नाजुक डील को खतरे में डाल दिया है और ट्रंप को इजरायल को चेतावनी देनी पड़ी है कि वह इसे “बर्बाद” न करे।


क्या है ट्रंप-ईरान डील?

ट्रंप प्रशासन और ईरान के बीच एक समझौता ज्ञापन (MOU — Memorandum of Understanding) पर सहमति बनी है। इस डील के प्रमुख बिंदु इस प्रकार हैं:

  • ईरान परमाणु हथियार न बनाने और न हासिल करने का वचन देगा।
  • ईरान अपने अत्यधिक समृद्ध यूरेनियम (HEU) के भंडार को ईरान के अंदर ही कम करेगा।
  • अमेरिका होर्मुज जलडमरूमध्य की नाकेबंदी 30 दिनों के भीतर हटाएगा।
  • अमेरिका ईरान के 24 अरब डॉलर के जमे हुए फंड को 60 दिनों की वार्ता अवधि के दौरान रिलीज करेगा।
  • 60 दिनों में अंतिम परमाणु और प्रतिबंध संबंधी समझौते को अंतिम रूप दिया जाएगा।

ट्रंप ने इस डील की घोषणा करते हुए कहा कि यह समझौता शुक्रवार को औपचारिक रूप से हस्ताक्षरित होगा। उन्होंने 2015 के ओबामा-युग के परमाणु समझौते (JCPOA) की आलोचना करते हुए इसे “परमाणु हथियार की ओर एक आसान, खूबसूरत रास्ता” करार दिया।


इजरायल को क्यों है आपत्ति?

इजरायल इस डील से गहरे असंतुष्ट है। इजरायली सूत्रों का कहना है कि यह समझौता उन प्रमुख मुद्दों को अनसुलझा छोड़ देता है जिनके कारण यह युद्ध शुरू हुआ था। इजरायल की मुख्य आपत्तियाँ:

1. बैलिस्टिक मिसाइलें बाहर

इजरायल का सबसे बड़ा डर यह है कि इस डील में ईरान के बैलिस्टिक मिसाइल कार्यक्रम को शामिल नहीं किया गया है। ईरान ने इस युद्ध के दौरान इजरायल और खाड़ी देशों पर 1,000 से अधिक बैलिस्टिक मिसाइलें और ड्रोन दागे थे।

2. ईरान के प्रॉक्सी नेटवर्क पर चुप्पी

इजरायल चाहता है कि ईरान अपने क्षेत्रीय प्रॉक्सी संगठनों — जैसे हिज़्बुल्लाह, हूती और अन्य — को समर्थन देना बंद करे। लेकिन इस डील में इस पर कोई प्रावधान नहीं है।

3. 60% समृद्ध यूरेनियम का सवाल

इजरायल को चिंता है कि यदि ईरान के पास 60% समृद्ध यूरेनियम का भंडार बना रहा, तो वह एक से दो साल में परमाणु हथियार बनाने की क्षमता हासिल कर सकता है।

4. “सनसेट क्लॉज” का डर

सूत्रों के अनुसार, वार्ता में एक सनसेट क्लॉज (Sunset Clause) का प्रस्ताव रखा गया है जो कुछ वर्षों बाद ईरान को कुछ परमाणु गतिविधियाँ फिर से शुरू करने की अनुमति देगा — ठीक 2015 के JCPOA की तरह।

एक इजरायली सूत्र ने कहा: “सबसे बड़ी चिंता यह है कि ट्रंप बातचीत से थककर कोई भी डील — अंतिम क्षण में रियायतें देकर — कर लेंगे।”


इजरायल ने क्या माँगा?

इजरायल ने स्पष्ट किया है कि उसे ट्रंप ने एक अधिक स्थायी डील का वादा किया है, जिसमें शामिल होना चाहिए:

  • समृद्ध यूरेनियम सामग्री को हटाना
  • संवर्धन ढाँचे को नष्ट करना
  • मिसाइल उत्पादन पर सीमाएँ
  • ईरान द्वारा क्षेत्रीय आतंकी प्रॉक्सी को समर्थन बंद करना

यानी इजरायल के मुताबिक जो अभी हुआ वह सिर्फ एक शुरुआती ढाँचा है — असली काम अभी बाकी है।


बेरूत हमले और ट्रंप की चेतावनी

इस नाजुक समझौते के बीच इजरायल ने बेरूत के दक्षिणी इलाकों पर हमले जारी रखे, जिससे स्थिति और तनावपूर्ण हो गई। ट्रंप ने इस पर तीखी प्रतिक्रिया देते हुए इजरायल और ईरान दोनों को चेतावनी दी कि वे इस डील को “बर्बाद” न करें।

पीबीएस की रिपोर्ट के अनुसार, यह डील अपने मौजूदा स्वरूप में इजरायल की सरकार को “गहरी निराशा” देने वाली है, क्योंकि पाकिस्तान और अन्य देशों द्वारा मध्यस्थता में हुई इन वार्ताओं से इजरायल को पूरी तरह बाहर रखा गया था।


अमेरिकी राजनीति में भी विवाद

यह डील अमेरिका में भी विवादों से घिरी है। ट्रंप की रिपब्लिकन पार्टी के कुछ नेताओं ने कहा कि यह समझौता 2015 की उस JCPOA से बेहतर नहीं है जिसे ट्रंप ने खुद अपने पहले कार्यकाल में खारिज किया था। डेमोक्रेट नेता और पूर्व राष्ट्रपति बराक ओबामा ने भी कहा कि शायद यह नई डील उनकी 2015 की डील से बहुत ज्यादा अलग या बेहतर नहीं होगी।


आगे क्या होगा?

  • 60 दिन की वार्ता अवधि में परमाणु और प्रतिबंध से जुड़े मुद्दों को हल करने की कोशिश होगी।
  • अंतिम डील अगस्त के मध्य तक हस्ताक्षरित होने की संभावना है।
  • इजरायल अपने हमले जारी रख सकता है अगर उसे यह नहीं लगा कि डील उसकी सुरक्षा के लिए पर्याप्त है।
  • ईरान ने कहा है कि वह अपनी “लाल रेखाओं” — परमाणु कार्यक्रम, जमे फंड की रिहाई और प्रतिबंध राहत — पर कोई समझौता नहीं करेगा।

निष्कर्ष

ट्रंप-ईरान डील मध्य-पूर्व में शांति की एक उम्मीद की किरण जरूर है, लेकिन इजरायल की नाराजगी और अनसुलझे मुद्दों के कारण यह समझौता अभी भी बेहद नाजुक अवस्था में है। अगर अगले 60 दिनों में परमाणु, मिसाइल और प्रॉक्सी के मुद्दों पर ठोस सहमति नहीं बनी, तो मध्य-पूर्व में एक बार फिर युद्ध की लपटें भड़क सकती हैं।

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